देवउठनी ग्यारस : कई मंगल कार्यों का शुभारंभ, देवउठनी ग्यारस का महत्व
देवउठनी एकादशी व तुलसी-शालिग्राम विवाह का पर्व चातुर्मास पूर्ण होने के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की 11वीं तिथि को मनाया जाता है। इस उत्सव को देव प्रबोधनी एकादशी भी कहा जाता है। इस साल यह पर्व रविवार, 6 नवंबर 11 को उत्तर भारत में पूरे उत्साह व आस्था से मनाया जाएगा। हमारे वेद-पुराणों में मान्यता है कि आषाढ़ माह में पड़ने वाली भड़ली नवमीं के बाद देव यानी विष्णु भगवान सो जाते हैं, तब से ग्यारस तक कोई शुभ कार्य नहीं किए जाते। माना जाता है कि दिवाली के बाद पड़ने वाली एकादशी पर देव उठ जाते हैं, इसीलिए इसे देवोत्थान (देवउठनी) एकादशी कहा जाता है। यही वजह है कि देवउठनी ग्यारस के बाद से सारे शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि प्रारंभ हो जाते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से रुके विवाहों या अन्य मंगल कार्यों के आयोजनों के पुनः आरंभ का। देवउठनी या देव प्रबोधिनि ग्यारस के दिन से मंगल आयोजनों के रुके हुए रथ को पुनः गति मिल जाती है। भारतीय पंचांग के अनुसार एकादशी की तिथि का महत्व यूं भी बहुत है। इस दिन पूजन के साथ व्रत रखने को भी बड़ा महत्व दिया जाता है। महिलाएं इस दिन आंगन में गेरू तथा खड़ी से मांडणे सजाती हैं और तुलसी विवाह के साथ ही गीत एवं भजन आदि के साथ सभी उत्सव मनाते हैं।
देवउठनी एकादशी : विष्णु-लक्ष्मी की उपासना का दिन
शास्त्रों में कार्तिक मास को श्रेष्ठ मास माना गया है। मासों में कार्तिक मास, देवताओं में भगवान विष्णु और तीर्थों में नारायण तीर्थ बद्रिकाश्रम श्रेष्ठ है। ये तीनों कलियुग में अत्यंत दुर्लभ हैं। अर्थात् कार्तिक मास के समान कोई भी मास नहीं है। पुराण में वर्णित है कि यह मास धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को देने वाला है। विशेष रूप से स्नान दान एवं तुलसी की पूजा इस मास में विशेष फलदायी है। कार्तिक मास में दीपदान करने से पाप नष्ट होते हैं। स्कंद पुराण में वर्णित है कि इस मास में जो व्यक्ति देवालय, नदी के किनारे, तुलसी के समक्ष एवं शयन कक्ष में दीपक जलाता है उसे सर्व सुख प्राप्त होते हैं।
इस मास में भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी के निकट दीपक जलाने से अमिट फल प्राप्त होते हैं। इस मास में की गई भगवान विष्णु एवं मां लक्ष्मी की उपासना असीमित फलदायी होती है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु, जो क्षीरसागर में सोए हुए थे, चार माह उपरान्त जागे थे। विष्णुजी के शयन काल के चार मासों में विवाहादि मांगलिक कार्यों का आयोजन करना निषेध है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य ने इसे 'महापुनीत पर्व' कहा है। इसलिए इसमें गंगा स्नान, दीपदान, होम, यज्ञ तथा उपासना अन्य दानों आदि का विशेष महत्व है। कहा गया है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है।
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Jyotish Visharad [ICAS]
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